इसे प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश की सामाजिक एकता के लिए बताया दुर्भाग्यपूर्ण
देहरादून। पिछले शनिवार आठ अगस्त को उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली का आयोजन किया गया था। रामलीला मैदान में आयोजित उक्त रैली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य सहित कई नेता शामिल थे। वहीं भाजपा ने भी आरोप लगाया कि खरगे की रैली के दौरान मुस्लिम धर्म के समर्थन में नारे लगाए थे। रैली के दो दिन बाद 10 अगस्त को श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास नाम के संगठन ने रामलीला मैदान पहुंच हवन करने के साथ गंगाजल भी छिड़क डाला। संगठन का कहना था कि रामलीला मैदान सनातन से जुड़े कार्यक्रमों का स्थल है। इसकी पवित्रता को खंडित किया गया है। जिसके बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रैली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य शामिल थे जो दलित वर्ग से आते हैं। इसलिए रामलीला मैदान में शुद्धीकरण हवन कार्यक्रम आयोजित किया गया। वहीं उत्तराखंड के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी रामलीला मैदान हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद कथित रूप से शुद्धिकरण हवन कराए जाने की घटना ने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
यशपाल आर्य ने कहा है कि उत्तराखंड की धरती सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोकतांत्रिक चेतना की भूमि रही है। हल्द्वानी जैसे शहर में इस प्रकार की घटना का सामने आना प्रदेश की सामाजिक एकता के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा नेताओं को यह समझना चाहिए कि समाज को जोड़ने का समय है, जाति और ऊंच-नीच की दीवारें खड़ी करने का नहीं।
मल्लिकार्जुन खड़गे केवल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि देश के वरिष्ठतम जननेताओं में से एक हैं। उनका सार्वजनिक जीवन संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष को समर्पित रहा है। ऐसे नेता की जनसभा के बाद मैदान का शुद्धिकरण करना सामाजिक बराबरी की उस भावना का अपमान है, जिसकी स्थापना के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अनेक महापुरुषों ने जीवनभर संघर्ष किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी सार्वजनिक स्थान की पवित्रता किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग या राजनीतिक विचारधारा से निर्धारित नहीं होती। लोकतंत्र में सार्वजनिक मैदान जनता के होते हैं और वहां अलग-अलग राजनीतिक दलों की सभाएं होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है। किसी राजनीतिक कार्यक्रम के बाद उस स्थान को ‘शुद्ध’ करने की कोशिश समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच जैसी पुरानी कुरीतियों को बढ़ावा देने वाली मानसिकता को प्रदर्शित करती है।
आर्य ने कहा कि भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया है। संविधान की मूल भावना सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देने की है। ऐसे में सार्वजनिक रूप से किए गए इस प्रकार के प्रतीकात्मक कृत्य समाज में गलत संदेश देते हैं और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करते हैं।
उनका भाजपा से सवाल है यदि किसी सार्वजनिक मैदान में किसी दलित नेता की सभा होने के बाद उसे शुद्ध करने की आवश्यकता महसूस की जाती है, तो क्या भाजपा नेतृत्व इस मानसिकता का समर्थन करता है? यदि नहीं, तो भाजपा को इस घटना पर अपना स्पष्ट पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए।
विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करके। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की जाति नहीं, बल्कि उसके विचार, कर्म और संवैधानिक अधिकार महत्वपूर्ण हैं।






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